Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verses 13–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १३ ॥
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह जो सद्वस्तु है, वह अविनाशी है ओर जो विनाशी है, वह असरूप ही है, इसलिए असद्रूप
बन्धुओ के देहादि का युद्ध में नाश होने पर भी कोई अनर्थ नहीं हो सकता, इस आशय से कहते हैं।
हे पार्थ, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हुआ है, उस सूक्ष्मतम वस्तु को तुम अविनाशी समञ्ञो।
इस अविनाशी वस्तु का कोई भी विनाश नहीं कर सकता । परिच्छेदशून्य, अप्रमेय और नित्य शरीरी
आत्मा के ये शरीर अनित्य कहे गये हैं, इसलिए हे भारत, तुम युद्ध करने के लिए तैयार हो
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