Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verses 15–16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verses 15–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 15,16
संस्कृत श्लोक
आत्मा चैकोऽस्ति न द्वित्वमसतः संभवः कुतः ।
अविनाशस्त्वनन्तोऽसौ सतो नाशो न विद्यते ॥ १५ ॥
द्वित्वैकत्वपरित्यागे शेषं यत्परिशिष्यते ।
शान्तं सदसतोर्मध्यं तदस्तीह परं पदम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
अद्रय होने के कारण उसके विनाशकर्ता की अप्रसिद्धि से भी आत्मा के नाश की प्रसक्ति नहीं हे,
यह कहते है ।
आत्मा एक हे, ओर द्रत हे ही नहीं अतः सत् की उत्पत्ति ही कहाँ से हो सकती हे । चूँकि सत् का
नाश नहीं होता, इसलिए यह सद्रूप परमात्मा विनाशशून्य ओर अनन्त हे । द्वित्व ओर एकत्व का यानी
कारण ओर कार्य का परित्याग कर देने पर जो सत् (कारण) ओर असत् (कार्य) के मध्य में अधिष्ठानरूप
सन्मात्र शेष बच जाता है, शान्तस्वरूप वह यहाँ परमपद आत्मा हे