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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 20,21

संस्कृत श्लोक

स कालदेशतो देहाज्जर्जरत्वमुपागतात् । वासनावशतो याति प्लक्षपर्णाद्रसो यथा ॥ २० ॥ श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्व देह से दूसरी देह में जाने में वासना ही निमित्त है, यह कहते हैं। देश और काल से जर्जर हुए शरीर से यह जीव वासना लेकर उस तरह निकल जाता है, जिस तरह देश और काल से जर्जर हुए वटवृक्ष के पत्ते से रस। कान, आँख, त्वचा, जिह्ा और नख इन इन्द्रियो को लेकर पूर्व शरीर से दूसरे शरीर में जीव उस तरह चला जाता है, जिस तरह फूलों से गन्ध लेकर वायु अन्यत्र चला जाता हे