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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verses 22–24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verses 22–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 22-24

संस्कृत श्लोक

वासनावत्त्वमेवास्य देहो नेतरयुक्तिजः । क्षीयते वासनात्यागे क्षीणे भवति तत्पदम् ॥ २२ ॥ वासनावान्परापुष्टो भूत्वा भ्राम्यति योनिषु । जीवो भ्रमभराभारो मायापुरुषको यथा ॥ २३ ॥ अक्षस्वभावानखिलाञ्छरीराद्वासनावशः । जीवो गृहीत्वा संयाति पुष्पाद्गन्धमिवानिलः ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

अतएव इसका स्थूलदेह भी वासनात्मक ही है, परन्तु चिरकालिक अनुवृत्ति से उसमें स्थूलता का भ्रम होता है, यह कहते हैं। इसका स्थूल-शरीर भी एकमात्र वासनारूप ही है यानी केवल वासना से ही उत्पन्न हुआ है, अन्य किसी दूसरे कारण से नहीं | अतएव वासना का त्याग होने पर वह क्षीण हो जाता है ओर उसके क्षीण हो जाने पर वह स्वयं ही परमपदरूप हो जाता है । यह वासनावेष्टित जीव दूसरे से यानी आत्मभूत अन्नपानादि से ही परिपुष्ट होकर अथवा लिंगदेह में अवच्छेद ओर प्रतिबिम्ब भाव से द्विगुणित प्रवेश से परमात्मा द्वारा परिपुष्ट (अभिव्यक्त) होकर अनेक भ्रमो का भार ढोता हुआ अनेक योनियं में उस तरह भ्रमण करता है जिस तरह माया से ऐन्द्रजालिक पुरुष (जादूगर) आकाश में भ्रमण करता हे । वासनावेष्टित यह जीव श्रोत्र आदि की सम्पूर्णं शब्दादि-ग्रहणशक्तियों को लेकर उस तरह इस शरीर से नूतन शरीर में जाता है, जिस तरह पुष्प से गन्ध लेकर वायु स्थानान्तर में जाता हे