Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verses 25–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verses 25–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 25-28
संस्कृत श्लोक
देहो निस्पन्दतामेति जीवे कौन्तेय निर्गते ।
निस्पन्दावयवाभोगः शान्तवात इव द्रुमः ॥ २५ ॥
अचेष्टं छेदभेदादिदोषैरायात्यदृश्यताम् ।
मृत इत्युच्यते तेन देहो विगतजीवितः ॥ २६ ॥
स जीवः प्राणमूर्तिः खे यत्र यत्रावतिष्ठते ।
तं तं स्ववासनाभ्यासात्पश्यत्याकारमाततम् ॥ २७ ॥
अयं देहो हि जीवेन त्वसन्नेवावलोकितः ।
अस्य नाशे त्वमप्येवं पश्य मा वा सुषुप्तवत् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
लोक में वही मरणरूप से प्रसिद्ध है, यह कहते है।
हे कौन्तेय, शरीर से जीव के निकल जाने पर देह उस प्रकार एकदम कम्पनशून्य हो जाती है, जिस
प्रकार वायु के शान्त हो जाने पर स्पन्दनशून्य अपनी शाखा-प्रशाखाओं के विस्तार से युक्त वृक्ष
कम्पनशून्य हो जाता हे । छेदन, भेदन आदि दोषों से चेष्टारहित होकर जीवरहित हुआ शरीर जब
अदृश्य हो जाता है तब उसी से वह 'मृत:” (मर गया) यों कहा जाता है । वह प्राणस्वरूप जीव चिदाकाश
या भूताकाश में जहाँ-जहाँ यानी देह, देश, काल, भोग्य आदि जिस-जिस आकार में अवस्थित होता
है (भोगजनक अदृष्ट से उद्भूत हुई वासना से युक्त होता है), विस्तृत उस-उस आकार का अपनी
वासना के अभ्यास से अवलोकन किया करता हे । हे अर्जुन, अतः जीव द्वारा असत्स्वरूप ही (मिथ्यारूप
ही) यह शरीर देखा जाता हे, इसलिए देहनाश भी तुम उसी तरह असद्रूप देखो । अथवा सुषुप्त पुरुष
की नाई उसे मत देखो अर्थात् जैसे सुषुप्त पुरुष कुछ भी नहीं देखता वैसे ही तुम भी देह, देहनाश
उसकी असत्यता आदि कुछ न देखो