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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

यथैव पश्यत्याकारांस्तेषां नाशांस्तथैव सः । आदिसर्गे भावनया किलैष्वेवं विभावतः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

जव प्रतियोगी ही वासना से कल्पित हैं, तब उनके नाश भी वासना कल्पित हैं, यह सृष्टि के आरम्भ से निश्चित है, यह कहते हैं। सृष्टि के आरंभ में चतुर्मुख ब्रह्माजी ने इन गो, अश्व आदि आकारवाले पदार्थो मे पूर्वसृष्टियों के अनुभवों से जनित वासना द्वारा ही विभावनावश इस तरह के रूपों की केवल कल्पना ही की है, मिट्टी और दण्ड लेकर कुम्हार की नाई किसी का निर्माण नहीं किया है, यह पुराणों मे प्रसिद्ध हे । वह जिस तरह इनके रूपों की कल्पना करता हे, उसी तरह उनके नाशो की भी कल्पना करता है