Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
झटित्युद्भवकाले हि यद्यथा दृश्यते पुरः ।
आनिपातं तदेवास्या अविनाभाविसंविदः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
उत्पत्ति-काल में वासनामय जगत् भले ही मिथ्याभूत हो, परन्तु स्थितिकाल में अर्थक्रियासमर्थ
होने एवं सर्वजनीन सत्यता का अनुभव होने से वास्तव ही है, ऐसी आशंका कर कहते है ।
उत्पत्ति-काल मेँ प्रथम क्षण में देह, घट आदि का जो आकार मिथ्याभूत या सत्यभूत सामने दीख
पडता है, वह विनाशपर्यन्त उसी तरह का रहता है, किसी दूसरी तरह का नहीं, क्योकि अधिष्ठानभूत
यह संवित् जो जिस तरह की वस्तु उत्पन्न हुई हो, उसकी उसी तरह की स्थिति में हेतु है ओर संवित्
के सिवा उनकी सत्ता ही नहीं रह सकती