Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
प्राक्तनं वासनामूलं पुरुषार्थेन जीयते ।
यत्नेनाद्यतनेनाशु ह्यस्तनायतनं यथा ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
देहादि आकार भले ही वासनामय हों, उससे प्रकृत मे क्या आया ? इस पर कहते है ।
पार्थ, पहले का वासनारूपी मूल पुरुषार्थ से (श्रवण, मनन आदि पुरुष प्रयत्नो से जनित ब्रह्माकार
अखण्डवृत्ति से) उस प्रकार बाधित हो जाता है, जिस प्रकार आज के प्रायश्चित्त आदि प्रयत्नो से गत
दिन का अधर्मनुष्ठान बाधित हो जाता है अथवा आज के दाहरूप प्रयत्न से गत दिन में निर्मित तृण-
गृह नष्ट हो जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि अशुभ वासनाओं से कल्पित देहादि आकार का शुभ वासनाओं
के अभ्यास से जनित ब्रह्माकारवृत्ति से समूल विनाश ही उसके वासनामय होने का फल हे