Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
य एव पुरुषार्थेन दृष्टो बलवता क्षणात् ।
पूर्वोत्तरविशेषांशः स एव जयति स्फुटम् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि ज्ञान के निमित्त प्रयत्न कर रहे बहुत से लोगों का प्रयत्न पहले काम, क्रोध आदि
प्रवल वासनाओं द्वारा नष्ट होता दिखलाई पडता है, अतः प्रबलता में उत्तरत्व को हेतु कह नहीं सकते ?
तो इस पर कहते हैं।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थो में जो भी कोई एक पुरुषार्थ “मेरे लिए यही पुरुषार्थ
आवश्यक है” इस अभिनिवेश से देखा जाता है, वही पूवोत्तर प्रयत्नो मे अपना विशेष महत्त्व रखता
है ओर अन्य को जीत लेता है । (एवं पूर्वोक्त ज्ञान के लिए प्रयत्न करनेवालों में "मोक्ष" का
अभिनिवेश मन्द ओर “भोग” का अभिनिवेश दृढ होने से ज्ञाननिमित्त प्रयत्नं का पराभव हो जाता
है, यह भाव हे)