Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
आसक्तिमाहुः कर्तृत्वमकर्तुरपि तद्भवेत् ।
मौर्ख्यस्थिते हि मनसि तस्मान्मौर्ख्यं परित्यजेत् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
मन के अज्ञता से युक्त रहने पर ही
आसक्ति होती है, जिसे कर्तृत्व कहते हैं। वह आसक्ति कर्म न करनेवाले को भी मूर्खतापूर्ण चित्त रहने
पर होती ही है, अतः मूर्खता छोड़ देना चाहिए