Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verses 6–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verses 6–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 6-8

संस्कृत श्लोक

परं तत्त्वज्ञमाश्रित्य निरासक्तेर्महात्मनः । सर्वकर्मरतस्यापि कर्तृतोदेति न क्वचित् ॥ ६ ॥ अविनाशमनाद्यन्तमात्मानमजरं विदुः । नश्यत्यात्मेति दुर्बोधो मा तवास्त्विह दुःखदः ॥ ७ ॥ न तथा परिपश्यन्ति विदितात्मान उत्तमाः । पश्यन्त्यनात्मनात्मानं स्वमात्मन्यात्ममानिनः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

उसमें उपाय बतलाते हैं। परम तत्त्वज्ञान का आश्रय करने के कारण आसक्तिरहित हुए महात्मा में, सम्पूर्ण कर्मों में तत्पर होने पर भी, कर्तृत्व किसी समय उदित नहीं होता । हे अर्जुन, यह आत्मा अविनाशी, आदि और अन्त से शून्य अजर कहा गया है इसलिए “आत्मा नष्ट होता है" यह दुःखदायी दुर्बोध तुम्हें न हो । उत्तम आत्मज्ञानी लोग “आत्मा नष्ट होता है, इस रूप से आत्मा को नहीं देखते। (क्यों नहीं देखते ? यदि यह पूछिये तो इसका उत्तर यह है) चूँकि वे आत्मा में ही आत्मा का अवलोकन किया करते हैं, इसलिए अपने आत्मा को अनात्म (देहादिरूप) नहीं देखते