Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 55, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 55, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
अर्जुन उवाच ।
एवं चेत्त्रिजगन्नाथ मूढानामपि मानद ।
देहनाशे समुत्पन्ने इष्टं नष्टं न किंचन ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी परिस्थिति में मूढ़ लोग आत्मबुद्धि से देहादि का अवलोकन किया करें, तथापि देहादि का
नाश हो जाने पर आत्मा का नाश नहीं होता, इसलिए उनको मरणादिरूप अनर्थ वस्तु ही न रही, ऐसी
अर्जुन शंका करते हैं।
अर्जुन ने कहा : मेरा सम्मान करनेवाले हे त्रिजगन्नाथ, ऐसी परिस्थिति में देह का नाश हो जाने पर
भी मूर्खो की कोई प्रियतम वस्तु नष्ट तो नहीं हुई