Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 56, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
व्योम्नः शून्यतमं विद्धि तथेदमखिलं जगत् ।
चित्तभित्तौ कृतं चित्रं यच्चिच्चित्रकरेण तत् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
अब तत्त्वतः अपरिचित चैतन्यात्मा चित्रकार है ओर उसके चित्र का आधार चित्तरूप दीवार है इस
प्रकार उत्प्रेक्षा करने पर भी अन्त में शून्यता ही पर्यवस्ित होती है, यह कहते हैं।
अर्जुन, तत्त्वतः अपरिचित आत्मचैतन्यरूपी चित्रकार ने चित्तरूप दीवार के ऊपर जो चित्र रचा है,
वह सर्वाश से शून्य होने के कारण असदाकाश से तनिक भी भिन्न नहीं है