Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 56, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
सर्वशून्यतया व्योम्नो मनागपि न भिद्यते ।
यथा प्रकचतश्चित्ते जगन्निर्माणसंक्षयौ ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें भी मनोराज्य का क्षणिक जगत् ही दृष्टान्त है, यह कहते है ।
हे अर्जुन, जैसे चित्त में मनोराज्य के जगत् का निर्माण और विनाश क्षणभर में ही हो जाता है,
वैसे ही ये चित्तात्मक दीवार के ऊपर अज्ञात चिति द्वारा चित्रित जगत् के निर्माण ओर विनाश
क्षणभर के लिए ही प्रतीत होते हैं, यह तुम जानो