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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 56, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 56, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा कैव सा वज्रसारता । चित्तचित्रकृतश्चित्स्थं जगच्चित्रं कदा स्थितम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

जो वस्तु स्थित रहती है, उसीके निरास में प्रयत्न की अपेक्षा होती है, यह जगत्‌ तो कभी स्थित ही नहीं है, यह कहते है। पार्थ, भला बतलाओ तो सही, चिति में अध्यस्त चित्तरूप चित्र-निर्माता का जगद्रूप यह चित्र किस समय स्थित रहता हे ? अपनी कारणसामग्री से शून्य तथा स्वयं असद्रूप जगत्‌-चित्र आँखों के सामने प्रस्फुरितहो रहा है - यह एक महान्‌ आश्चर्य है, यह कहते हैं। तथापि यह महान्‌ आश्चर्य है कि अपनी आधारभूत दीवार से रहित, चित्र के साधनभूत नील, पीत आदि र॑ग-द्रव्यों से शून्य यह जगत्‌-चित्र सामने विस्तृत-सा दिखाई दे रहा है