Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 57, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 57, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।
इदं विद्धि महाश्चर्यमर्जुनेह हि यत्किल ।
पूर्वं संजायते चित्रं पश्चाद्भित्तिरुदेति हि ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
वासना की शिथिलता में उपयोगी होने से पूर्व में प्रदर्शित जयत् में आश्वर्यतादुष्टि का ही वर्णन
करते हैं।
श्रीभगवान् ने कहा : हे अर्जुन, इस संसार के विषय में सबसे बढ़कर यह आश्चर्य समझो कि पहले
तो निराश्रय में जगद्रूप चित्र उत्पन्न होता है और उसके बाद आधाररूप भूत, भुवन आदि विराट् दीवार
उत्पन्न होती है । (व्यष्टि-समूहस्वरूप समष्टिभूत विराट् की कल्पना व्यष्टिकल्पना के अधीन है,
इसलिए भी उसकी बाद में उत्पत्ति है, यह जानना चाहिए)
सर्ग सन्दर्भ
छप्पनर्वौ सर्ग समाप्त यत्तावनवाँ सर्ग जिस दृष्टि से मन शीघ्र ही वासनाशून्य हो जाता है ओर सुखस्वरूप अद्वितीय आत्मा अवशिष्ट रह जाता है, उस दृष्टि का उपदेश ।