Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 57, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 57, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
अभित्तावुत्थिते चित्रे दृश्यते भित्तिरातता ।
अहो विचित्रा मायेयं मग्नं तुम्बं शिला प्लुता ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
हे अर्जुन, पहले निराश्रय चित्र के
उत्पन्न हो जाने पर पीछे उसकी आश्रयभूत विशाल दीवार दीख पड़ती है : अहो ! यह एक अद्भुत माया
है। इसका स्वरूप अत्यन्त असंभावित है, इसलिए यह माया है और अत्यन्त विरुद्ध होने से इसका
स्वरूप असंभावित है, इस आशय से प्रसिद्ध इस प्रकार की माया का दृष्टान्त देते हैं।
यह उस तरह की है, जिस तरह तुम्बी जल में डूबती हो ओर पत्थर की चट्टान तैरती हो