Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 57, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 57, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
वेष्टितं वासनारज्ज्वा दीर्घसंसृति दामवत् ।
वासनोद्वेष्टनेनैव तदिहोद्वेष्ट्यतेऽर्जुन ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे अर्जुन, (जब तुम जगत् में
चिदाकाशता की दृष्टि रखते हो तब तो) जिसमें दीर्घ भ्रमण है, ऐसा जगद्रूप यह चित्र रज्जु की नाई
फैली हुई वासनारूप रज्जु से यदि वेष्टित होता हे, तो वह चिदाकाश भी इस जगत् में वासना के
वेष्टन से वेष्टित होता ही हे