Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verses 29–30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 59, verses 29–30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 29,30

संस्कृत श्लोक

भोगाभावनमेवेह परमं ज्ञत्वलक्षणम् । इतो नाभिमताः सर्वे ज्ञस्य भोगाः स्वभावतः ॥ २९ ॥ भवन्ति कोऽतितृप्तो हि दुरन्नं किल वाञ्छति । एतदेव परं विद्धि ज्ञत्वस्यापरलक्षणम् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसा कौन कारण है, जिससे यह विषयों का चिन्तन नहीं करता ? इस पर कहते हैं । श्रीरामभद्र, आत्मतत्त्वज्ञान के प्रभाव से ही स्वभावतः तत्त्वज्ञ पुरुष को सभी तरह के विषय अभीष्ट नहीं होते; क्योकि एसा कौन अत्यन्त तृप्त पुरुष है, जो अस्वादु अन्न की इच्छा करता हो । श्रीरामजी, जीवन्मुक्तता का दूसरा (को नु भूत्वाऽनुबध्नामि" इत्यादि श्लोकों से वर्णित विवेक आदि लक्षणों सेभिन्न दूसरा) असाधारण लक्षण आप इसे ही समझिए, जो स्वभाव से ही विषयों की अनभिलाषा है