Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 59, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
योऽन्तः प्ररूढः स्वभ्यासो ज्ञत्वशब्देन स स्मृतः ।
यो न भुङ्क्ते भुज्यमानानपि भोगान्स बुद्धिमान् ।
लोकानुरोधसिद्ध्यर्थं स हन्ति लगुडैर्नभः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
जनसाधारण की तरह उसकी जो देहधारण के साधन भोगो मे प्रवृत्ति है, वह तो वृथा चेष्टा ही है,
यह कहते है ।
शरीर रक्षणार्थं लोगों का अनुरोध सिद्ध करने के लिए अन्न आदि विषयों का ऊपर-ऊपर से
उपभोग कर रहा भी जो परमार्थतः उपभोग नहीं करता, वही वास्तव में तत्त्वज्ञ है ओर इस प्रकार
लोकानुरोध-सिद्धि के लिए ऊपर-ऊपर से जो चेष्टा करता है, वह मानों दण्ड से आकाश का ताडन
करता है । तात्पर्य यह निकला कि आकाशताडन में प्रवृत्त अज्ञजनों का अनुरोध स्वीकार कर
आकाशताडन में प्रवृत्त बुद्धिमान् पुरुष की चेष्टा जैसे उसके किसी भी अर्थ के लिए नहीं होती, वैसे ही
प्रकृत में भी समञ्जना चाहिए