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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 59, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

विना कृत्रिमया बुद्ध्या न सिद्धिरवगम्यते ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

शंका हो कि यदि वह वृथा चेष्टा है, तो “सव लोगों द्वारा किया गया दण्डो से आकाश-ताडन मेरा ही है” इस बुद्धि की तरह भोक्ता, भोग्य एवं भोगो के आकारो में परिणत स्वात्मचिति ही सर्वात्मक है” यह पूर्वोक्त बुद्धि भी भ्रान्तबुद्धि होने से कृत्रिम ही ठउहरी; फिर वह जीवन्मुक्त के लक्षणरूप से कैसे कही गयी ? कृत्रिम बुद्धि के ("मैं ही सर्वात्मा हूँ” इस प्रकार की सर्वात्मभावनारूप वृत्ति के) बिना निरतिशय आनन्दात्मक आत्मतत्त प्राप्त नहीं होता। तात्पर्य यह है कि कृत्रिम भी सर्वात्मदर्शन परिच्छिन्न आत्मदृष्टि के निरास द्वारा तत्त्वज्ञान में उपयोगी है; अतएव वह जीवन्मुक्त के लक्षणरूप से कही गयी है। तब वेहात्मबुद्धि के निरास द्वारा तत्त्वदर्शन के प्रति उपयोगी होने से हाथ, पैर आदि अपने अंगों के छेदन, भेदन आदि साहसिक कर्म भी उसके लक्षण क्यो नहीं होंगे ? इसपर कहते हैं। कहीं पर यानी शास्त्रों या विद्वानों के अनुभवों में सर्वात्मदर्शन की तरह अपने अंगों के अवदलन आदि साहसों का भी यदि आत्मदर्शन में उपयोग प्रसिद्ध होता तो वह भी लक्षण हो सकता; परन्तु वैसी स्थिति नहीं है। (अथवा “विनाकृत्रिमया" यहाँ “अकृत्रिमया' ऐसा पदच्छेद कर तदनुसार यह अर्थ करना चाहिए कि) आत्मस्वरूप के आविर्भाव में अपरिच्छिन्न, आकार से शून्य ब्रह्माकार अखण्डवृत्ति को छोड़कर अपने अंगों के छेदन, भेदन आदि के सदुश कठिनतम साहसों का कुछ भी उपयोग नहीं प्रतीत होता