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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verses 34–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 59, verses 34–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 34-36

संस्कृत श्लोक

क्वचिदात्मावलोके च स्वाङ्गावदलनैरपि । चिच्चेत्यं चेत्यकोटिस्था तावत्पश्यति विभ्रमम् ॥ ३४ ॥ इदं यावदबोधात्मा स्पन्दते स्पन्दरूपिणी । सम्यग्बोधोदयोन्तः स्यात्स्पन्दास्पन्ददशाक्रमः ॥ ३५ ॥ क्वापि याति च संशान्तदीपवत्साभिधानकः । चितः प्रशान्तरूपाया दीपिकायाः स्वभावतः ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

यह चिति जब तक अज्ञान से आवृत्त रहती है तब तक स्वप्रकाश्य वृत्ति आदि के वर्ग में प्रविष्ट होकर स्वयं ही स्पन्दरूप-सी होती हुई बाह्य-विषयों की ओर जाती है ओर विभ्रम देखती है। जब भीतर उत्तम तत्त्वज्ञान का उदय हो जाता है तब स्पन्दअस्पन्द-दशा का यह क्रम, शान्त दीपक की नाई, अपने नाम के साथ न जाने कहाँ चला जाता है ? वास्तव में स्वभावतः प्रशान्तस्वरूप, चितिरूपा दीपिका की यहाँ स्पन्द एवं अस्पन्द रूपा कुछ भी कथा नहीं हो सकती