Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verses 37–39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 59, verses 37–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 37-39
संस्कृत श्लोक
स्पन्दास्पन्दमयी नेह कथैवास्ति मनागपि ।
यदस्पन्दस्य मरुतो न सन्नासन्न मध्यगम् ॥ ३७ ॥
रूपं तदेवासंवित्तिस्पन्दायाः प्रशमं चितेः ।
अभिन्नः स्याच्चितः स्पन्दः शुद्धचित्स्फाररूपधृक् ॥ ३८ ॥
न बन्धाय न मोक्षाय स्थित आत्मनि केवलम् ।
चिच्चेन्निरर्थसंवित्तिनिर्वाणे न च विन्दते ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राण-चेष्टा की आत्यन्तिक शान्ति भी वही है, यह कहते हैं।
स्पन्दरहित पवन का जो रूप न सत् है, न असत् है और न उनके मध्यग यानी अनिर्वचनीय ही है;
उसे ही अज्ञान एवं स्पन्द से शून्य चिति का प्रशम अर्थात् "मोक्ष" मुनि लोग जानते हैं | जब चिद्रूप चिति
का यह स्पन्दन शुद्धचिति के बृहदाकार ब्रह्माकार को धारण करता है, तब केवल आत्मा में स्थित हुआ
यह न बन्ध के लिए अर्थात् बन्ध का भागी ओर न मोक्ष के लिए ही अर्थात् मोक्ष का ही भागी होता हे । यह
चिति यदि व्यर्थभूत चित्ताकार ओर उसकी शान्तिरूप दो दशाओं को प्राप्त न करे तो इसमें बन्ध, मोक्ष
आदि पक्षों की नाममात्र से भी सत्ता न रहे