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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 59, Verse 40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 59, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

तद्बन्धमोक्षपक्षादेर्नामापीह न विद्यते । मोक्षोऽस्त्वित्येव बोधोऽन्तः पूर्णता क्षयकारणम् ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, “मुझे मोक्ष हो" यह बोध ही आत्मा की पूर्णता के नाश का हेतु है ओर "वह (मोक्ष) न हो" यह भी आपके बन्ध के लिए हेतु हे । तब कल्याण के लिए क्या करना योग्य है ? इस शंका पर कहते है। अतः इनका (बन्ध एवं मोक्ष का) अज्ञान ही कल्याण है । तात्पर्य यह निकला कि चूँकि मुझे "मोक्ष हो" इस ज्ञान से भी आत्मा की पूर्णता नष्ट होती है ओर “मोक्ष न हो" इससे भी बन्ध होता है, इसलिए बन्ध ओर मोक्ष का स्मरण न करना ही आपके लिए कल्याणकर हे