Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त रीति से यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी भली प्रकार प्रबुद्ध हो चुके थे, तथापि दूसरे श्रोताओं के वैसे ही
ज्ञान की उत्पत्ति के लिए प्रवृत्त हो रहे भगवान वसिष्ठजी महाराज कहे जानेवाले देह ओर आत्मा के
विवेक आदि के श्रवण के लिए श्रीरामजी को भी अनुकूल करते हुए कहते है।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे महाबाहो, अब फिर भी आप मेरे उत्तम वचनो का श्रवण कीजिए,
जिन्हे मैं उपदेश के तात्पर्य विषय निरतिशयानन्दरूप आत्मा के अनुभवरूपी प्रीति-के पात्र आपसे सब
जनों के हित के लिए कहता हू
सर्ग सन्दर्भ
पॉँचवाँ सर्ग समाप्त छठा सर्ग देह और आत्मा का विवेक, देह में आत्मदर्शन से दुःख तथा अंगनाओं के संग से मूढो के मोह की अभिवृद्धि इन विषयों का वर्णन |