Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 5, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 5, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
अनुभववशतो हृदब्जकोशे स्फुटमलितां समुपागतेन नाथ ।
तव वरवचसेह वीतशोकां चिरमुदितां च दशामुपागतोऽस्मि ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे स्वामिन्,
अपने हृदयकमल के कोश में भ्रमरवत सुस्थिर हुए आपके सुन्दर विस्पष्ट वचनामृतों से मैं यहीं पर यानी
इसी देश ओर काल में स्वकीय अनुभववश शोकशून्य, चिरकाल से सदा उदित ओर मुदित जीवन्मुक्त
दशा प्राप्त कर चुका हू