Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
एकोदये द्वितीयस्य न सत्ता दिनरात्रयोः ।
ज्ञानं नाज्ञानतामेति च्छाया नायाति तापताम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
परस्पर उपघाती स्वभाव से युक्त होने से भी ऐक्य की प्रसक्ति नहीं है, ऐसा कहते हैं।
एक दूसरे की अपेक्षा अत्यन्त विलक्षण दिन एवं रात दोनों में से किसी एक की सत्त्वदशा में दूसरे का
जब अस्तित्व रह ही नहीं सकता, तब अन्योन्यरूपता की कथा ही क्या ? बस ठीक इसी प्रकार ज्ञान न
अज्ञानरूप हो सकता है ओर अन्धकार न प्रकाशरूप है, दोनों एक दूसेर से अत्यन्त भिन्न हैं, अत: एक
की सत्ता में दूसरे की सत्ता नहीं हो सकती