Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
सद्ब्रह्म नासद्भवति विचित्रास्वपि दृष्टिषु ।
मनागपि न संश्लेषः सर्वगस्यापि देहिनः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
विचित्र (विभिन्न) दृष्टियों में सद्रूप ब्रह्म कभी
असरूप (देहादिरूप) नहीं हो सकता ओर आत्मा में अध्यस्त असत् देहादि के साथ सर्वव्यापक सद्रूप
देहाधिष्ठान प्रत्यगात्मा का तनिक सम्बन्ध भी नहीं हो सकता