Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
देहेन देहगस्यापि कमलस्येव वारिणा ।
मनागपि न संश्लेषो ब्रह्मणो देहसत्तया ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
दृष्टान्त बतलाने के लिए प्रतिपादित अर्थ का ही पुनः कथन करते है।
जैसे जल में स्थित कमल का जल से किंचिन्मात्र सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही देहाधिष्ठान आत्मरूपी
ब्रह्म का भी देहसत्ता के साथ स्वल्पमात्र भी सम्बन्ध नहीं हो सकता। भगवान भाष्यकार ने कहा भी है -
"यत्र हि यदध्यासस्तत्कृतेन गुणेन दोषेण वा अणुमात्रेणाऽपि स न संबध्यते" | जिस अधिष्ठान में जिस
पदार्थ का अध्यास होता है, वह अध्यस्त पदार्थ के गुण या दोष से तनिक भी सम्बद्ध नहीं होता