Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
यत्र तत्रोदिताक्रान्ता रटन्ति प्रस्फुरन्ति च ।
तृणकाष्ठादिकं सर्वमाहरन्ति त्यजन्ति च ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
वे तृण, काष्ठ लाते हैं और उनका परित्याग भी करते हैं, वे तरगों के सदृश
अतिचपल अवयवो से युक्त तथा शब्द, स्पर्श, रूप आदि विषयों के लाभ से अपने आपको कृतार्थ
समझते हैं