Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
सशब्दस्पर्शरूपाढ्यास्तरङ्गतरलाङ्गकाः ।
जडाः सन्तः स्फुरद्रूपा भृशं स्फाररसासवाः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
देह आदि स्वयं जड ही हैं, तथापि चेतन-से होकर भोगाभिनिवेश रूपी मदिरावत्
उन्मादक रस से घूर्णित रहते हैं, वे दुर्बुद्धि से भरे ओर नदियों की तरह विहार, आगम ओर अपाय
आदि चेष्टाओं से युक्त रहते हैं