Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
पुनःपुनर्निवर्तन्ते युगं प्रत्यचला इव ।
शरीरधनदारादावास्थां समनुबध्नतः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
देह, धन, रत्री आदि मे आसक्ति रखनेवाले अज्ञानी का यह दुष्ट
दुःख कभी भी शान्त नहीं होता