Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
इदं दुर्दुःखमज्ञस्य न कदाचन शाम्यति ।
अनात्मनि शठे देहे आत्मभावमुपेयुषि ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस अनात्मभूत, शठ देह में आत्मभाव प्राप्त करनेवाले पुरूष
में असत्यबोधमयी माया क्या किसी प्रकार भी नष्ट हो सकती है ? अर्थात् किसी प्रकार नष्ट नहीं
हो सकती