Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
कण्टकश्चैति पयसो दूर्वाङ्कुर इव स्थलात् ।
देहशाल्मलिभोगिन्यो मनोमातङ्गश्रृंखलाः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
मनरूपी हाथी की
श्रुखलाभूत देहरूप सेमल के वृक्ष-कोटर में रहनेवाली सर्पिणीरूपी आशाएँ अज्ञानी पुरुषों में राग
आदि साँपों को उस प्रकार उत्पन्न करती हैं, जिस प्रकार उत्तम रीति से जोते गये खेत से किसान
धान उत्पन्न करते हैं। अथवा मनोरूप मातंग की श्रृंखलाभूत आशाएँ दुःख उत्पन्न करती हैं, यों
आन्तर ओर बाह्य विषयों के भेद की कल्पना कर दो रूपकों की योजना करनी चाहिए