Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
जरा मरणमभ्येति मूढस्यैव पुनःपुनः ।
जगज्जीर्णारघट्टेऽस्मिन्रज्ज्वा संसृतिरूपया ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानी पुरुष ही इस जगतरूपी जीर्णं घटीयन्त्र में (रहट में) संसाररूपी रज्जु से वेधा
हुआ मज्जन और उमज्जन द्वारा कलशरूपता प्राप्त करता रहता है