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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 50

संस्कृत श्लोक

स्पष्टीकर्तुं न शक्यन्ते जन्मचक्रस्य नेमयः । अज्ञेनेन्द्रियगृध्रार्थं रागान्मृगयुणा तनुः ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञानी व्याध ने इन्द्रियरूपी गीधों के लिए (यानी शिकार के योग्य श्येन आदि के लिए) रागवश (मृगया के व्यसन से) अपनी देहपरम्परा को संसाररूपी अरण्य में दूर तक यानी सर्वत्र ओर सर्वदा मांस के पिण्ड की नाई फेलाया हे