Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
संसारारण्य आस्तीर्णा दूरादामिषपिण्डवत् ।
भूतशैलमयी दृष्टिर्मृन्मांसलवमात्रिका ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
“आमिषपिण्डवत्” यहाँ पर वतिप्रयोग भ्रान्तिद्रष्टि से भेद का अभाव होने पर सादृश्य का अभाव
होने से किया गया है, इस आशय से कहते है।
वास्तव में मांस के लवमात्र ओर मृत्तिका के लवमात्र रूप मनुष्य, पशु, मृग आदि प्राणियों से
तथा हिमालय, विन्ध्याचल, मलय आदि पर्वतो से प्रचुर दृष्टियाँ मोह से (तत्त्व के अज्ञान से जनित
कल्पना से) लक्षित होती हैं