Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
जडस्याज्ञस्य तुच्छस्य कृतघ्नस्य विनाशिनः ।
शरीरकोपलस्यास्य यद्भवत्यस्तु तत्तथा ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
जड, अज्ञानी, तुच्छ,
कृतघ्न (आत्मा से अपनी प्रसिद्धि पाकर उसी को दुःखभागी बनाने के कारण कृतघ्न) तथा विनाशस्वभाव
इस तुच्छ शरीररूपी पत्थर का जो कुछ भी होनेवाला हो वह भले ही हो, इससे आत्मा का कुछ भी
सम्बन्ध नहीं है