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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 6, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

आदत्ते तत्कथं नित्यं चिन्मयत्वं सदोदितम् । ययोरेकपरिज्ञाने जडतैवाऽपरस्थिता ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

तब देह में ही चैतन्यरूप धर्म मान लीजिए, उससे कोई विरोध तो होता है नहीं, इस प्रकार की आशंका का उद्भावन कर कहते हैं। यह शरीर उस सदा उदितस्वभाव अविनाशी चैतन्यरूपत्व का परिग्रह कैसे कर सकता हे ? क्योकि चित्‌ और जड़ इनमें से किसी एक का परिज्ञान करने में भी एक जगह तो (परिशेषात्‌ शरीर में ही) अवश्य ही जडता आ जायेगी तात्पर्य यह है कि देह चिन्मय हे, ऐसा परिज्ञान तभी हो सकता हे, जब जडभिन्न चेतनरूपता का भली प्रकार परिचय हो जाय, उसका ठीक-ठीक परिचय होने पर तो देह मेँ ही जडता सिद्ध हो जाती है, ऐसी स्थिति में देह अपने स्वभावविरुद्ध चिद्रूपता का केसे ग्रहण करेगा ?