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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 60, Verses 1–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 60, verses 1–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 1-5

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एवमाद्यं परं तत्त्वं चिद्धनं परमं पदम् । तत्स्था एते महारूपा ब्रह्मविष्णुहरादयः ॥ १ ॥ विभूतिभिः स्फुरन्त्युच्चैर्जनास्तुष्टा नृपा इव । आकाशगमनाद्याभिः क्रीडाभिः क्रीड्यते चिरम् ॥ २ ॥ तत्स्थेनैव जनेनेह स्वर्गे स्वर्गौकसो यथा । तत्प्राप्याङ्ग न म्रियते तत्प्राप्याङ्ग न शोच्यते ॥ ३ ॥ तत्प्राप्य जीव्यते नाङ्ग तत्प्राप्याङ्ग न रुध्यते । अपारपरमाकाशरूपिणः परमात्मनः ॥ ४ ॥ सत्तासामान्यरूपं चेन्मनागपि विभाव्यते । तत्त्वं निमेषमात्रेण जन्तुर्मुक्तमना मुनिः । कुर्वन्संसारकर्माणि न भूयः परितप्यसे ॥ ५ ॥ श्रीराम उवाच । मनो बुद्धिरहंकारश्चित्तं यत्र क्षयं गतम् । सत्तासामान्यमाभातं मनस्वी स किमुच्यते ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे देवता लोग स्वर्ग में क्रीडा करते हैं, वैसे ही उस ब्रह्मपद में ही स्थित मनुष्य, गन्धर्व आदि जन आकाशगमन आदि क्रीडाओं से यहाँ चिरकाल तक क्रीडा करते हे । सम्पूर्णं आनन्दो के उत्कर्ष की परमावधिरूप ब्रह्म को तत्त्वज्ञान से प्राप्त कर यह जीव न तो जीव धर्म क्षुधा आदि से मरता है और न उसे प्राप्त कर शोक करता है । हे श्रीरामचन्द्रजी, उसे प्राप्त कर तृष्णा आदि से न पीडित होता है ओर न दीवार आदि से अवरूद्ध होता है । असीम परमाकाशस्वरूप उस परमात्मा के सर्वत्र अनुस्यूत सत्तासामान्यरूप तत्त्व की सांसारिक कर्म कर रहा साधारण जन्तु शरीर भी यदि क्षण भर स्वल्प भावना करता है, तो मुक्त मन होकर जब मुनि बन जाता है, फिर संसार में सन्तप्त नहीं होता, तव आप जैसे उत्तम शरीरवालों के लिए तो कहना ही क्या ?