Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 60, Verses 7–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 60, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 7,8

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यद्ब्रह्म सर्वदेहस्थं भुङ्क्ते पिबति वल्गति । आदत्ते विनिहन्त्यन्तः संवित्संवेद्यवर्जितम् ॥ ७ ॥ तत्सर्वगतमाद्यन्तरहितं स्थितमर्जितम् । सत्तासामान्यमखिलं वस्तुतत्त्वमिहोच्यते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस सामान्यरूप की भावना से जन्तु परितप्त नहीं होता, वह सत्तासामान्यरूप क्या निर्विशेष है या सविशेष ? यदि निर्विशेष कहें, तो विभूति का वर्णन असंगत होगा । यदि उसे सविशेष कहते हैं, तो उसे प्राप्त कर जन्तु पुनः परितप्त नहीं होता, यह जो आत्यन्तिक परिताप के उच्छेद का वर्णन किया गया है, वह युक्त नहीं है, इस आशय से श्रीरामजी पूछते हैं। महर्षे, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्तरूप सर्वद्वेत जहाँ नष्ट हो गया है, ऐसा विशेषरहित पूर्ण चिन्मात्र ही सत्तासामान्यरूप है, क्या यह आप कहते हैं या मन आदि सब विशेषों से युक्त सर्वात्मा ईश्वर सत्तासामान्यरूप है, यह कहते हैं ?।६॥ प्रपंच का बाध होने के बाद परिशिष्ट सत्तासामान्य निर्विशेष है और उसके पूर्वकाल में रहनेवाला सत्तासामान्य सविशेष है, यों दोनों का विभाग करके हमने नहीं कहा है, किन्तु सम्पूर्ण जीवभावों में, ईश्वरभाव में और मुक्ति में जो अखण्ड एक लम्बे दण्डे की नाई सन्मात्र अनुस्यूत है, वही हमने कहा है और वही जगत्‌ का तत्त्व है। उसमें आपका अभिप्रेत कोई विरोध है ही नहीं, इस आशय से वसिष्ठजी समाधान करते हैं। भद्र, जो ब्रह्म सब देहों में स्थित होकर खान, पान और गमन करता है, जो जाग्रत, स्वप्न और सृष्टिकाल में वस्तुओं का ग्रहण करता है, जो सुषुप्ति ओर प्रलय काल में उनका नाश कर देता है तथा जो तुरीयावस्था में संवित्‌ और संवेद्य से वर्जित रहता है; सर्वव्यापी, आदि और अन्त से शून्य, और सर्वदा विद्यमान रहता हुआ भी, कण्ठस्थित विस्मृत हार की नाई, बोध से प्राप्त हुआ अखिल वस्तुओं का सारभूत है वही यहाँ पर सत्तासामान्यशब्द से कहा गया है