Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 61, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
स्फुरत्यम्भो द्रवत्वेन यथावर्तविवर्तनैः ।
यथा स्वप्नात्मिकैवेयं सर्गलक्ष्मीर्न वास्तवी ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, जब यह सृष्टिशोभा स्वप्नस्वरूप
ही है, तत्त्वतः सत्यरूप नहीं है; तब सर्गादि के साथ वह प्राजापत्यपद भी प्रलय में ही चला गया यानी
अत्यन्त असत्रूप ही हो गया | इसीलिए - न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधक: | न मुमुक्षुर्न वै
मुक्तिरित्येषा परमार्थता ॥ (न प्रलय है, न उत्पत्ति है, न बद्ध है, न साधक है, न मुमुक्षु हे ओर न मुक्ति
ही है - यही परमार्थता हे ।) यह प्रसिद्ध श्रुति वचन अपना अस्तित्व रखता है