Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, Verses 17–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 61, verses 17–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 17-27
संस्कृत श्लोक
विचित्रास्त्रिषु लोकेषु दृश्यन्ते वस्तुदृष्टयः ।
जलमध्ये ज्वलत्यग्निर्यथाब्धौ वडवानलः ॥ १७ ॥
नगराण्यम्बरे सन्ति यथा वैमानिकाश्रयाः ।
शिलास्वब्जानि जायन्ते हेमाद्राविव पादपाः ॥ १८ ॥
एकान्ते सर्वपुण्यानि सन्ति कल्पतरौ यथा ।
शिलाः फलन्ति फलिवद्यथा रत्नगुलुच्छकाः ॥ १९ ॥
शिलान्तः प्राणिनः सन्ति भेका इव शिलान्तरे ।
दृषदो वारि निर्याति चन्द्रकान्तोपलादिव ॥ २० ॥
निमेषेण घटो याति पटतां स्वापसंविदि ।
असत्यमपि बुध्येत स्वप्ने स्वमरणं यथा ॥ २१ ॥
आकस्मिकं जलं व्योम्नि ध्रियते भूतगं यथा ।
वितानमिव खे वारि तिष्ठति स्वर्णदी यथा ॥ २२ ॥
उड्डीयन्ते शिलाः स्थूलाः पक्षवन्तो यथाद्रयः ।
शिलान्तः प्राप्यते सर्वं ननु चिन्तामणेरिव ॥ २३ ॥
चिन्तितानि फलन्त्याशु देवोद्यानान्तरेष्विव ।
तान्येव न फलन्त्याशु मोक्षादीनां च राघव ॥ २४ ॥
अचेतनोऽपि कुरुते कर्म यन्त्रपुमानिव ।
एवमाद्यास्तथान्ये च विचित्रारम्भविभ्रमाः ॥ २५ ॥
दृष्टाः शम्बरगन्धर्वविलासैरप्यसंभवाः ।
देशकालक्रियाद्रव्यरत्नसंचरणीयजाः ॥ २६ ॥
अर्था गन्धर्वजनिता अनन्ताः सत्यसंभवाः ।
असंभवः संभवोऽयमपि भाव्युपपद्यते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् में असंभावित अनेक पदार्थो का दर्शन दृष्टान्तरूप से बतलाते हैं।
श्रीरामजी, (जगत् में चित्र-विचित्र ऐसे अद्भुत आश्चर्य दिखाई पड़ते हैं कि) जल के बीच आग
जलती है, जैसे-समुद्र में वडवानल । और आकाश में अनेक नगर हैं, जैसे-देवताओं के स्वर्गादि
निवास-स्थान। भद्र, देखिए जैसे, शिलाओं में कमल उत्पन्न होते हैं, हेमाद्रि-पर्वत में (मृत्तिकारहित
प्रदेश में) वृक्ष उत्पन्न होते है । कल्पतरू में एक देश में सम्पूर्ण पुण्यों के फलस्वरूप वांछित पदार्थ रहते
हैं (५) | जैसे वृक्षो की नाई शिलाएँ चिन्तामणियों के गुच्छे फलती है, शिलाओं के भी भीतर प्राणी रहते
हैं, जैसे-शिला के मध्य में मेढक । पत्थर से पानी बहता है, जैसे-चन्द्रकान्तमणि के पत्थर से ओर
स्वप्न में क्षणभर में ही घट पटरूपता को प्राप्त हो जाता है। अत्यन्त असत् वस्तुओं का भी ज्ञान होता
है, जैसे-स्वप्न मेँ अपने मरण का । और पृथ्वी आदि भूतां में स्थित जल अकस्मात् आकाश में भी
धारण किया जाता है। वितान (चँदोवा) के समान आकाश में भी जल स्थित रहता है, जैसे-मन्दाकिनी ।
स्थूल शिलाएँ भी उड़ती हैं, जैसे-पंखवाले पर्वत । इसमें सन्देह नहीं कि शिला के भीतर सब कुछ पाया
जा सकता है, जैसे-चिन्तामणि में इस संसार के भीतर सभी चिन्तित विषय शीघ्र वैसे ही फलते है,
जैसे- नन्दनवन के भीतर । श्रीराघव, “मोक्ष उत्पन्न हो", ब्रह्म नष्ट हो", “प्रपंच सत्य हो", “भोग
शाश्वत हो जाय, “मर्यादा भंग हो", वेद अप्रमाण हो जाय” इत्यादि मोक्ष आदि के विषय में सत्यसंकल्प
लोगों के शीघ्र चिन्तित भी मनोरथ नहीं फलते यानी उत्पन्न नहीं होते । हे श्रीरामचन्द्रजी, अचेतन भी
कर्म करता है, जेसे- यन्त्रपुरुष । श्रीरामजी, इत्यादि पूर्व मे उक्त ओर दूसरे भी असंभावित विचित्र
कार्यो के विभ्रम शम्बर (दैत्यविशेष) ओर गन्धर्वो की माया के विलासो से देखे गये हँ । जो देश ओर
काल में मन्त्रप्रयोग आदि क्रियाओं से, ओषधादि द्रव्यो से, मणियों से तथा पिशाच, आदि के संचारो से
उत्पन्न हैं, वे विचित्र कार्यो के विभ्रम भी देखे गये हैं जो कि सत्य पदार्थो की नाई अर्थक्रियाकारी अनन्त
एवं गन्धर्वनगर के सदुश जनित हैँ । यहाँ दूरत्वादि देश में चन्द्रमा का प्रादेशिकत्व आदि और काल में
ओत्पातिक नभःकवबन्ध आदि विभ्रम उदाहरण समझने चाहिए । इस समय असंभव भी यह ब्रह्माण्ड-
नाश आदि भविष्यत् में संभव हो जाता है । ओर इस समय संभव भी सूृष्टिरूप स्वप्नविभ्रम प्रलय एवं
तत्त्वबोध में असंभव होता हुआ स्वरूपविश्रान्ति के लिए समर्थ हो जाता है