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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, Verses 28–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 61, verses 28–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 28-31

संस्कृत श्लोक

संभवोऽसंभवः सम्यक् सिद्धये स्वप्नविभ्रमः । न तदस्ति न यत्सत्यं न तदस्ति न यन्मृषा ॥ २८ ॥ सर्वं सर्वेण सर्वत्र स्वप्ने सर्गाभिधानके । स्वप्ने निमग्नधीर्जन्तुः पश्यति स्थिरतां यथा ॥ २९ ॥ सर्गस्वप्ने मग्नबुद्धिः पश्यति स्थिरतां तथा । भ्रमाद्भ्रमान्तरं गच्छन्स्वप्नात्स्वप्नान्तरं व्रजन् । अतिस्थिरप्रत्ययभागिह जीवो विमुह्यति ॥ ३० ॥ श्वभ्रान्तरं श्वभ्रनिपातदोषात् संप्राप्नुवन्मुग्धमृगः प्रयाति । मोहं यथा पातमयैकरूपं जीवस्तथा संसृतिपात्रमूढः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

एवं ब्रह्मरूप से देखने पर असत्य कुछ भी नहीं है ओर जगद्रूप से देखने पर तो कुछ भी सत्य नहीं है, यह फलित हुआ, यह कहते है। श्रीरामजी, (ब्रह्मरूप से देखनेपर) वैसा कुछ भी नहीं है, जो सत्य न हो; ओर (जगद्रूप से देखने पर तो) वैसा कुछ भी नहीं है, जो असत्य ही न हो । सृष्टिनामक हिरण्यगर्भ के इस स्वप्न में सर्वत्र सबसे सब कुछ होता ही हे । जिस प्रकार स्वप्न में निमग्न बुद्धि प्राणी वस्तुओं की स्थिरता ही देखता है, उसी प्रकार सृष्टिरूप स्वप्न में भी निमग्नबुद्धि विषयों की स्थिरता देखता ही हे । संसार में अत्यन्त स्थिरता- (५) यहाँ यदि "पण्यानि" ऐसा पाठ हो तो पणन” यानी व्यवहार और उसके योग्य वस्तुएँ” यह अर्थ समझना चाहिए । यदि “पुष्पाणि यह पाठ हो, तो उसका अर्थ स्पष्ट है । सर्वत्र "यथा" शब्द उदाहरणार्थक है | बुद्धि रखनेवाला यह जीव एक भ्रम से दूसरे भ्रममें और एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न मे जाते हुए मोह को प्राप्त करता है । श्रीरामभद्र, जैसे मुग्धमृग गड्ढे में गिरानेवाले अपने मोहरूप दोष से एक गड्ढे में गिरकर पुनः दूसरे गड्ढे में गिरता है, वैसे संसार में गिरनेवाले राग, द्वेष आदि से मूढ यह जीव-जिसका गिरना ही एक स्वरूप है, मृग की तरह बीच मेँ से निकल सकना संभव है ही नहीं ऐसे-मोह में यानी देहादिरूप गर्त में प्रवेश-भ्रम को प्राप्त होता हे