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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 61, Verses 9–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 61, verses 9–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

असत्यमेव तद्विद्धि यदसत्येन साध्यते । असत्येऽर्थे समर्थेऽपि न युक्तं भावनं घनम् ॥ ९ ॥ येन तेन परित्याज्यमसद्भावनभावनम् । दृढप्रत्ययितं स्वप्नपुरुषाद्यत्समुत्थितम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसा ही सही, उससे भी प्रकृत मे क्या आया ? इस पर कहते हैँ । श्रीरामजी, असत्यभूत मनःकल्पित स्वप्नपुरुष से जो उत्पन्न किया जाता है, वह भी असत्यरूप ही उत्पन्न होता हे । इसलिए जन्मान्तर, स्वर्ग, नरक आदि अर्थक्रियासमर्थ भी असत्यभूत अर्थो में (विषयों मे) दढ सत्यता की भावना करना युक्त नहीं हे, यह जानिए । भद्र, चूँकि वह भावना युक्त नहीं हे, इसलिए स्वप्नपुरुष से उत्पन्न जो असत्‌ पदार्थो की भावना है, दृढ़ सत्यरूप से प्रतीत हुई भी वह छोड ही देनी चाहिए