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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 62, Verses 7–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 62, verses 7–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 7-17

संस्कृत श्लोक

तेन चित्तनरेणाथ कृतं नामात्मवाञ्छया । जीवटोऽस्मीति सहसा काकतालीयवत्स्थितम् ॥ ७ ॥ जीवटो विजहाराथ स स्वप्नपुरुषश्चिरम् । स्वप्ननिर्माणनगरे कस्मिंश्चित्पुरवीथिषु ॥ ८ ॥ तत्र पानं पपौ मत्तो भृङ्गः पद्मरसं यथा । लीलयैव दृढं हृष्टः सुष्वाप घननिद्रया ॥ ९ ॥ स्वप्ने ददर्श विप्रत्वं पाठानुष्ठानतुष्टिमत् । प्रतिभामात्रसंपन्नां चित्ते देशान्तराप्तिवत् ॥ १० ॥ कदाचित्स द्विजश्रेष्ठस्त्वहर्व्यापारनिष्ठया । सुष्वापान्तर्व्यवहृतिर्बीजतायामिव द्रुमः ॥ ११ ॥ द्विजोऽपश्यत्स्वयं स्वप्ने सामन्तत्वमथात्मनि । स सामन्तः कृताहारः कदाचिद्धननिद्रया ॥ १२ ॥ अपश्यद्राजतां स्वप्ने ककुब्वलयपालिनीम् । लालितां भोगपूगेन पुष्पौघेण लतामिव ॥ १३ ॥ स कदाचिन्नृपः स्वस्थः सुष्वापास्तमितेहितः । पुरोभाविनिजाचारः स्वकार्यमिव कारणे ॥ १४ ॥ अपश्यत्स्वात्मनि स्वप्ने सुरस्त्रीत्वमनिन्दितम् । वृक्षकोशरसोल्लासे मञ्जरीत्वमिवोदितम् ॥ १५ ॥ सा सुरस्त्री रतिश्रान्ता निद्रां गाढामुपागता । मृगीत्वमात्मनि स्वैरमावर्तत्वमिवाम्बुता ॥ १६ ॥ सा मृगी लोलनयना कदाचिन्निद्रया हृता । स्वप्ने ददर्श वल्लीत्वं स्वाभ्यासाद्दृढमात्मनि ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

स्थित वृक्ष की नाई, चित्त में संस्काररूप से स्थित सभी व्यवहारो से युक्त होकर सो गया । इसके बाद (गाढ निद्रा को प्राप्त हुए) स्वयं उस द्विजराज ने स्वप्न मेँ अपने को मेघमाला-सी घनी हाथी, घोडे आदि सेनाओं से युक्त मण्डलिक राजा देखा । भोजन किये हुए उस माण्डलिक राजा ने किसी एक दिन गाढ निद्रा द्वारा स्वप्न में अपनी आत्मा में वह चक्रवर्तिता देखी, जो समस्त दिकृमण्डल का पालन करने में समर्थ ओर पुष्प-समुह से लता की नाई भोग-समूह से युक्त थी । कारण में अपने कार्य की नाई अर्थात्‌ बीज में वृक्ष की नाई भविष्य में फल देने के लिए उन्मुख हुए स्त्रीविषयक आसक्तिरूपी आचार से युक्त वह सम्राट किसी एक दिन स्वस्थ एवं समस्त चेष्टाओं से रहित होता हुआ सो गया । तदनन्तर स्वप्न में वह सम्राट अपनी आत्मा में बहुत पुरुषों द्वारा भोग करने पर भी अनिन्दित अप्सरारूपता को उस प्रकार देखने लगा, जिस प्रकार वृक्ष के कोश में स्थित रस का उल्लास (4) अपने में आविर्भूत मंजरीत्व को देखता हे । सुरत से श्रान्त, अतएव गाढ निद्रा को प्राप्त हुई उस देवांगनाने (मृगीनयनों की सौन्दर्याभिलाषा रूप वासना से) अपनी आत्मा में अभिलषित वैसे ही मृगीरूपता देखी, जैसे जल की साम्यावस्था आवर्तरूपता देखती है । तदनन्तर किसी दिन चंचल नेत्रा एवं गाढ निद्रा से आक्रान्त हुई उस मृगी ने स्वप्न में अपने में वल्लीत्व देखा, जो अभ्यासवश दृढ़ हुआ था