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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verses 10–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 63, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

तेनावयवबन्धेन बहिः स्वैरविहारिणी । लीलाऽविलुलिताकारा यदा रम्येति भावतः ॥ १० ॥ सर्वभावोपमर्देन तदभ्यासवशात्तदा । तामेव सोऽन्वभूद्भिक्षुस्त्यक्त्वान्यं मननोदयम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मज्ञान से शून्य उस भिश्च में रम्यवस्तुओं में इदन्त्व (यह) या अहन्त्व (मैं) बुद्धि रखने के कारण वित्तनिरोध के अभ्यास में पूटुता होने से पूवदिहादि के आत्यन्तिक विस्मरणशक्ति की उत्पत्ति हुई, यह दिखलाते है । वधे हुए पद्मासन से स्थिरता रखनेवाले उस भिक्षु न, स्थूल देह के अवयव तथा लिंगदेह के अवयव प्राण, इन्द्रिय आदि के निरोध द्वारा बाहर देवता आदि विषयों में चित्त की स्वैर विहार करनेवाली मानस- पूजा आदिरूप लीला “यह सुन्दर है” इस भावना से ज्यों -ही अविकलरूप से प्रारम्भ की, त्यों ही वह (भिक्षु) उसके अभ्यासवश तत्‌-तत्‌ विरुद्ध सम्पूर्णं भावों को दबाकर, दूसरे मननोदय को छोडकर उसी लीला का अनुभव करने लगा