Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 63, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
काकतालीययोगेन कदाचित्साधुसंगमात् ।
अशुभो भावनाभ्यासो जीवस्य विनिवर्तते ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि तव तुल्ययुक्ति से अशुभ भी भावनाभ्यास शुभ भावनाभ्यास से व्यवहित होने पर
भी पुनः उत्पन्न होगा ?
काकतालीय न्याय से कभी महात्माओं का अचानक समागम प्राप्त हो जाने से जीव का यह अशुभ
भावनाभ्यास भलीभाँति नष्ट हो जाता हे