Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 63, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
संगत्यधिगतं चैष केवलं स्वोदयं प्रति ।
प्राक्तनो वासनाभ्यासो हातुरुद्यममीक्षते ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो जैसे केवल पहले के संस्कारों से अशुभ वासनाभ्यास उत्पन्न होता है, वैसे ही शुभ
वासनाभ्यास भी स्वयं ही उत्पन्न हो जायेगा ओर उसीकी सामर्थ्यसे यह पुरूष (जीव) अशुभ वासना ओं
को भी छोड देगा; अतः उसके लिए पुरुषप्रयत्न का विधान व्यर्थ ही है ? यदि ऐसी कोई आशंका करे, तो
(59) प्रस्तुत श्लोक में “भूयो भूयः” पद से बीच के हाथी, भँवरा, हंस आदि नब्बे जन्मों का भी
उसे स्मरण हुआ, यह बतलाया गया है ।
उस पर कहते हैं।
दुर्वासना-जाल को छोड़ने की इच्छा कर रहे पुरुष का यह पूर्वतनीय सद्बासना का अभ्यास
कालान्तर मेँ (विरुद्ध अनेक जन्मों के व्यतीत हो जाने पर) अपने उद्भव के प्रति सत्संगति से प्राप्त
सत्पुरुषों के प्रयत्न की एकमात्र अपेक्षा रखता है, उसके बिना उत्पन्न नहीं होता, यह भाव है