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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 63, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 63, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 63 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

यच्चेहाभ्यस्यतेऽजस्रं यच्च देहान्तरेऽपि च । जाग्रत्स्वप्नेष्वसदपि तत्सदित्यनुभूयते ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

और वह पुरुषप्रयत्न भी जब अनेक जन्मों के अभ्यस्त एवं दृढ़ीभूत सद्वासना से समन्वित होगा तभी दुर्वासना का क्षय करने में समर्थ हो सकता है, सहसा नहीं इस आशय से कहते हैं। जो इस देह में तथा दूसरे देहो में भी जाग्रत्‌ एवं स्वप्न में निरन्तर अभ्यस्त किया जाता है, परमार्थतः असद्रूप भी वह सद्रूप से अनुभूत होता है। तात्पर्य यह निकला कि मिथ्यार्थविषय देवतोपासना आदिस्वरूप प्रयत्न भी जहाँ जाग्रत्‌ एवं स्वप्न काल में सत्यतानुभव के योग्य देवताभाव आदि फल उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं; वहाँ पर श्रवण आदि प्रयत्न, जो कि परमार्थतः सत्यवस्तुविषयक है, प्रमाणगम्य परमार्थ-सत्यस्वभाव के लाभ के लिए समर्थ होगे ~ इसमें कहना ही क्या ?